सत्य की यात्रा
— "सत्य की यात्रा"
क्या ईश्वर को देखा जा सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर न तो केवल "हाँ" है, न ही केवल "नहीं"।
शायद उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम खोज कहाँ रहे हैं और खोज कैसे रहे हैं।
दूध के भीतर घी होता है, पर वह आँखों से दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं कि घी है ही नहीं। उसे पाने के लिए एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है—दूध, दही, मंथन और फिर घी।
शायद ईश्वर का अनुभव भी ऐसा ही है।
कोई केवल जीवन जीकर चला जाता है। कोई पूजा तक सीमित रहता है। कोई शास्त्र पढ़ता है। लेकिन कोई अपने भीतर उतरता है, मन का मंथन करता है, सत्य की खोज करता है।
संभव है कि अनुभव उसी को हो, जिसने खोज को जीवन बना लिया हो।
मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने अंतिम सत्य जान लिया है। मैं केवल इतना कहता हूँ कि सत्य की खोज अभी जारी है।
यदि ईश्वर है, तो वह किसी एक धर्म, जाति या व्यक्ति का नहीं हो सकता। और यदि सत्य है, तो वह तर्क, अनुभव और विनम्रता—तीनों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
"सत्य की यात्रा" किसी मत का प्रचार नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने और सत्य की खोज करने का एक विनम्र प्रयास है।
आपका क्या विचार है?
क्या ईश्वर का अनुभव केवल व्यक्तिगत होता है, या उसे किसी सार्वभौमिक रूप में भी समझा जा सकता है?
अपने विचार अवश्य लिखें। क्योंकि प्रश्नों से ही विचार जन्म लेते हैं, और विचारों से ही सत्य की यात्रा आगे बढ़ती है।
— मदन सिंह शेखावत लामिया
सत्य की यात्रा 🌿

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