— "सत्य की यात्रा" क्या ईश्वर को देखा जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर न तो केवल "हाँ" है, न ही केवल "नहीं"। शायद उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम खोज कहाँ रहे हैं और खोज कैसे रहे हैं। दूध के भीतर घी होता है, पर वह आँखों से दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं कि घी है ही नहीं। उसे पाने के लिए एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है—दूध, दही, मंथन और फिर घी। शायद ईश्वर का अनुभव भी ऐसा ही है। कोई केवल जीवन जीकर चला जाता है। कोई पूजा तक सीमित रहता है। कोई शास्त्र पढ़ता है। लेकिन कोई अपने भीतर उतरता है, मन का मंथन करता है, सत्य की खोज करता है। संभव है कि अनुभव उसी को हो, जिसने खोज को जीवन बना लिया हो। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने अंतिम सत्य जान लिया है। मैं केवल इतना कहता हूँ कि सत्य की खोज अभी जारी है। यदि ईश्वर है, तो वह किसी एक धर्म, जाति या व्यक्ति का नहीं हो सकता। और यदि सत्य है, तो वह तर्क, अनुभव और विनम्रता—तीनों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। "सत्य की यात्रा" किसी मत का प्रचार नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने और सत्य की खोज करने का एक विनम्र प्रयास है। आपक...
सत्य की यात्रा विषय: क्या हर लोकप्रिय बात सत्य होती है? "यदि लाखों लोग किसी बात को मानते हों, तो क्या वह अपने आप सत्य बन जाती है?" यह प्रश्न जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा है। इतिहास गवाह है कि कई बार पूरी दुनिया ने ऐसी बातों पर विश्वास किया जो बाद में असत्य सिद्ध हुईं। कभी लोगों को लगता था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसके चारों ओर घूमता है। यह विश्वास बहुत लोकप्रिय था, लेकिन सत्य कुछ और था। इसका अर्थ यह है कि लोकप्रियता और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। आज सोशल मीडिया के युग में किसी भी बात को लाखों लोग साझा कर देते हैं। लोग कहते हैं—"इतने लोग कह रहे हैं, तो सही ही होगा।" लेकिन सत्य का निर्णय भीड़ नहीं करती, प्रमाण करते हैं। सत्य को न तालियों की आवश्यकता होती है, न समझौतों की। सत्य अकेला भी हो सकता है, फिर भी सत्य ही रहता है। इसी प्रकार असत्य के पीछे लाखों लोग खड़े हो सकते हैं, फिर भी वह असत्य ही रहेगा। याद रखिए— भीड़ दिशा बता सकती है, लेकिन सत्य का प्रमाण नहीं बन सकती। इसलिए किसी भी विचार को स्वीकार करने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न पूछिए— क्या इसका कोई प्रमाण है? क्या...
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