सत्य की यात्रा जारी है
हर व्यक्ति सत्य चाहता है, लेकिन क्या हर व्यक्ति सत्य को स्वीकार भी करना चाहता है?
सत्य का सबसे बड़ा विरोधी झूठ नहीं होता, बल्कि हमारा अहंकार होता है।
जब तक सत्य हमारे पक्ष में होता है, हम उसका स्वागत करते हैं। लेकिन जैसे ही सत्य हमारी गलती दिखाता है, हम उसे नकारने लगते हैं।
सत्य न किसी का मित्र होता है, न शत्रु। न वह किसी धर्म का होता है, न किसी जाति का। न वह किसी अमीर का होता है, न गरीब का।
सत्य केवल सत्य होता है।
इसीलिए सत्य की राह आसान नहीं होती। उस पर चलने वाले को पहले अपने ही भ्रम, अपने ही अहंकार और अपने ही पूर्वाग्रहों से लड़ना पड़ता है।
शायद इसीलिए महापुरुषों ने कहा कि सत्य को जानना कठिन नहीं है, स्वयं को सत्य के सामने खड़ा करना कठिन है।
एक प्रश्न आपके लिए—
यदि कल यह सिद्ध हो जाए कि आपकी वर्षों पुरानी कोई मान्यता असत्य थी, तो क्या आप उसे छोड़ देंगे... या केवल इसलिए पकड़े रहेंगे क्योंकि वह आपकी मान्यता है?
यही "सत्य की यात्रा" का पहला नियम है— "सत्य का सम्मान व्यक्ति से बड़ा और विचार से भी बड़ा होना चाहिए।"
– मदन सिंह शेखावत लामिया
सत्य की यात्रा 🌿

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