सत्य की यात्रा जारी है
क्या हम सत्य की खोज करते हैं, या केवल अपने विश्वास की पुष्टि?
प्रस्तावना
हर व्यक्ति कहता है कि वह सत्य के साथ है। लेकिन क्या वास्तव में हम सत्य की खोज करते हैं? या फिर हम केवल उन्हीं बातों को स्वीकार करते हैं जो हमारी पहले से बनी हुई मान्यताओं के अनुकूल हों?
सत्य का सबसे बड़ा शत्रु झूठ नहीं, बल्कि हमारा अहंकार और पूर्वाग्रह है।
यदि कोई विचार हमारी सोच के विरुद्ध हो, तो हम उसे बिना समझे ही अस्वीकार कर देते हैं। लेकिन यदि वही बात हमारी मान्यता के अनुसार हो, तो बिना प्रमाण के भी स्वीकार कर लेते हैं।
यही कारण है कि संसार में मतभेद बढ़ते हैं, जबकि सत्य एक ही रहता है।
सत्य किसी धर्म, जाति, व्यक्ति या पुस्तक का बंधक नहीं है। सत्य वहाँ मिलता है जहाँ मन विनम्र हो, बुद्धि खुली हो और हृदय में सीखने की इच्छा हो।
एक प्रश्न स्वयं से पूछिए—
यदि कल यह सिद्ध हो जाए कि मेरी वर्षों पुरानी कोई मान्यता गलत थी, तो क्या मैं उसे छोड़ने का साहस रखूँगा?
यदि उत्तर "हाँ" है, तो समझिए कि आपकी सत्य की यात्रा शुरू हो चुकी है।
निष्कर्ष
सत्य तक पहुँचने का मार्ग बहस से नहीं, बल्कि प्रश्न, अनुभव, तर्क और विनम्रता से होकर गुजरता है।
याद रखिए—
"सत्य का सम्मान व्यक्ति से बड़ा और विचार से भी बड़ा होना चाहिए।"
— मदन सिंह शेखावत लामिया
सत्य की यात्रा 🌿

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